कार्यस्थल पर लैंगिक समानता: नीतियों की धूप में भेदभाव की छाया

समान वेतन कानून होने के बावजूद महिलाएँ आज भी पुरुषों से 20-28% कम वेतन पाती हैं — सरकार की नाकामी का आईना

भारत में कार्यस्थल पर लैंगिक समानता का प्रश्न केवल महिलाओं का नहीं, बल्कि राष्ट्रीय उत्पादकता और न्याय का प्रश्न है। Equal Remuneration Act 1976, POSH Act 2013, Maternity Benefit Amendment Act 2017 ,इन सब कानूनों के बावजूद भारतीय कार्यस्थल पर महिलाएँ आज भी दोहरे शोषण की शिकार हैं: एक ओर वेतन असमानता, दूसरी ओर यौन उत्पीड़न और असुरक्षा। सरकार की नीतियों और उनके क्रियान्वयन के बीच की खाई ही इस समस्या की जड़ है।

India Wage Report 2018

ILO की ‘India Wage Report 2018’ के अनुसार, भारत में लैंगिक वेतन अंतर 34% तक है — अर्थात एक पुरुष जो ₹100 कमाता है, वहीं काम करने वाली महिला को मात्र ₹66 मिलते हैं। World Economic Forum की Global Gender Gap Report 2023 में भारत 146 देशों में 127वें स्थान पर है। NCRB 2022 के अनुसार, POSH Act के अंतर्गत 422 मामले दर्ज हुए, जबकि विशेषज्ञ मानते हैं कि वास्तविक घटनाएँ इससे कई गुना अधिक हैं क्योंकि नौकरी खोने के भय से अधिकांश महिलाएँ शिकायत नहीं करतीं।

CMIE (Centre for Monitoring Indian Economy) के आँकड़े बताते हैं कि 2023 में भारत में महिला श्रम बल भागीदारी दर (FLFPR) मात्र 19.7% थी, जो वैश्विक औसत 47% से बहुत पीछे है। दक्षिण एशिया में भी यह सबसे कम है।

सरकार की आलोचना

सरकार की सबसे बड़ी विफलता यह है कि Equal Remuneration Act 1976 को लागू करने के लिए कोई प्रभावी निगरानी तंत्र नहीं बनाया गया। श्रम मंत्रालय के अपने आँकड़े बताते हैं कि 2022-23 में समान वेतन उल्लंघन के मामलों में अभियोजन की दर नगण्य रही। POSH Act लागू हुए एक दशक बीत जाने के बाद भी 10 से कम कर्मचारियों वाले प्रतिष्ठानों में Internal Complaints Committee (ICC) गठन अनिवार्य नहीं है — जहाँ देश की 80% महिला श्रमशक्ति काम करती है।

Maternity Benefit Amendment Act 2017 में 26 सप्ताह की मातृत्व छुट्टी का प्रावधान करना सरकार का सकारात्मक कदम था, परंतु FICCI के एक सर्वेक्षण ने पाया कि इस कानून के बाद नियोक्ताओं ने महिला भर्ती में 12-14% की कमी कर दी। सरकार ने इस ‘नियोक्ता दंड’ की भरपाई के लिए कोई प्रोत्साहन योजना नहीं बनाई।

समस्या का विश्लेषण

कार्यस्थल पर लैंगिक असमानता के मूल में तीन कारण हैं — पहला, सामाजिक-सांस्कृतिक पूर्वाग्रह जो महिलाओं को ‘कम उत्पादक’ मानता है; दूसरा, असंगठित क्षेत्र में महिलाओं की अधिकता जहाँ श्रम कानूनों का पालन न के बराबर होता है; तीसरा, घरेलू जिम्मेदारियों का असमान बँटवारा जो महिलाओं की पेशेवर उन्नति को सीमित करता है।

विशेषज्ञों की राय

अर्थशास्त्री रोहिणी पंडे का शोध बताता है कि भारत में महिला श्रम बल भागीदारी में 10% वृद्धि से GDP में 1.4 लाख करोड़ रुपये की बढ़ोतरी हो सकती है। IIM बैंगलोर की प्रो. रत्ना बत्रा का मत है कि कार्यस्थल नीतियाँ तब तक प्रभावशाली नहीं होंगी जब तक ‘care economy’ को राष्ट्रीय नीति में मान्यता नहीं मिलती।

समाधान एवं निष्कर्ष

वेतन पारदर्शिता कानून लागू हो जिसके तहत कंपनियाँ लिंग-वार वेतन डेटा प्रकाशित करें। POSH Act की शिकायत समितियों को सभी क्षेत्रों में अनिवार्य किया जाए। नियोक्ताओं को महिला भर्ती और पदोन्नति पर कर-छूट दी जाए। कार्यस्थल पर लैंगिक समानता केवल महिलाओं का नहीं, समूचे समाज का लाभ है। जब तक सरकार केवल कानून बनाने से आगे बढ़कर उनके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी नहीं उठाती, बदलाव कागजों तक ही सीमित रहेगा।

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