देशभर में 1.2 करोड़ SHG, फिर भी ग्रामीण महिलाओं की आर्थिक स्वायत्तता क्यों अधूरी है?

स्वयं सहायता समूह (Self Help Groups -SHG) भारत के ग्रामीण और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में महिला सशक्तिकरण का सबसे व्यापक प्रयोग बन चुके हैं। National Rural Livelihoods Mission (NRLM) के अंतर्गत ‘दीनदयाल अंत्योदय योजना’ ने SHG नेटवर्क को अभूतपूर्व विस्तार दिया है। परंतु इस विस्तार के पीछे छुपी वास्तविकता -ऋण की उपलब्धता, बाजार तक पहुँच और टिकाऊ आय -पर सरकार की उपेक्षा चिंताजनक है।
तथ्यात्मक आँकड़े
Ministry of Rural Development की 2023 वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, DAY-NRLM के तहत 9.29 करोड़ से अधिक महिलाओं को 87 लाख से अधिक SHG में संगठित किया गया है। इन समूहों को ₹6.37 लाख करोड़ से अधिक का बैंक ऋण मिल चुका है। NPA (Non-Performing Assets) दर मात्र 2-3% है, जो पुरुष ऋणियों की तुलना में काफी कम है।
परंतु NABARD की ‘Status of Microfinance Report 2022-23’ बताती है कि SHG के माध्यम से प्रति महिला औसत ऋण मात्र ₹52,000 है -जो कोई सार्थक व्यावसायिक उद्यम शुरू करने के लिए अपर्याप्त है। इसके अतिरिक्त, 60% से अधिक SHG सदस्याएँ उपभोग ऋण (consumption loan) लेती हैं, न कि उत्पादक निवेश के लिए।
सरकार की आलोचना
सरकार की सबसे बड़ी विफलता SHG उत्पादों के लिए बाजार उपलब्ध कराने में है। ‘लखपति दीदी’ योजना के तहत 3 करोड़ महिलाओं को लखपति बनाने का लक्ष्य घोषित किया गया, परंतु इस लक्ष्य की पूर्ति हेतु पर्याप्त बाजार संपर्क, ब्रांडिंग और तकनीकी सहायता का अभाव है। CAG की 2022 रिपोर्ट ने पाया कि NRLM के अंतर्गत आवंटित प्रशिक्षण बजट का 35% से अधिक खर्च नहीं हुआ।
‘आजीविका ग्रामीण एक्सप्रेस योजना’ और ‘महिला ई-हाट’ जैसी योजनाएँ शुरू तो की गईं, परंतु इनकी पहुँच और प्रभाव सीमित रहा। सरकारी खरीद नीति (GeM पोर्टल) में SHG उत्पादों के लिए विशेष प्रावधान होने के बावजूद ग्रामीण महिलाएँ डिजिटल पंजीकरण और प्रतिस्पर्धी मूल्य निर्धारण में असमर्थ हैं।
समाजिक प्रभाव एवं विशेषज्ञ राय
J-PAL के एक बड़े अध्ययन ने पाया कि SHG सदस्यता से महिलाओं में घरेलू निर्णय लेने की क्षमता में 18-22% सुधार हुआ और बच्चों के टीकाकरण में वृद्धि हुई। परंतु अर्थशास्त्री डॉ. निलुफर अहमद का मत है कि ‘बचत और ऋण’ के चक्र से बाहर निकलकर उद्यमिता की ओर बढ़ने के लिए SHG मॉडल को आमूल पुनर्संरचना की आवश्यकता है।
समाधान एवं निष्कर्ष
SHG उत्पादों के लिए जिला स्तर पर स्थायी बाजार केंद्र स्थापित किए जाएँ। प्रत्येक SHG को ‘बिजनेस कॉरेस्पॉन्डेंट’ के रूप में प्रशिक्षित किया जाए। बैंकों को SHG को कोलैटरल-मुक्त उत्पादन ऋण देने का लक्ष्य निर्धारित किया जाए। SHG केवल सरकारी योजनाओं का माध्यम नहीं, बल्कि महिला उद्यमिता की नींव होनी चाहिए।
