73वाँ संशोधन के 30 साल -वित्तीय शक्ति, जवाबदेही और पारदर्शिता का संकट
73वें संविधान संशोधन (1992) के माध्यम से पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा मिला और इन्हें ‘लोकतंत्र की पाठशाला’ कहा गया। तीन दशक बाद भी यह पाठशाला कई मामलों में नीतिगत उपेक्षा, वित्तीय निर्भरता और जवाबदेही के अभाव से ग्रस्त है। सुशासन का सपना तब तक अधूरा है जब तक ग्राम पंचायतें वास्तविक स्वायत्तता से वंचित हैं।
Ministry of Panchayati Raj की 2023 वार्षिक रिपोर्ट के अनुसार, 14वें और 15वें वित्त आयोग ने पंचायतों को क्रमशः ₹2 लाख करोड़ और ₹2.36 लाख करोड़ आवंटित किए। परंतु CAG की अनेक राज्य-स्तरीय रिपोर्टों से स्पष्ट होता है कि यह राशि राज्यों के माध्यम से ग्राम पंचायतों तक पहुँचने में औसतन 6-8 माह की देरी होती है।
NITI Aayog के Panchayat Advancement Index (PAI) 2022-23 के अनुसार, देश की 50% से अधिक पंचायतें ‘developing’ श्रेणी में हैं और केवल 7% ‘performing’ श्रेणी में। Comptroller and Auditor General की 2022-23 रिपोर्ट में 18 राज्यों की पंचायतों में ₹8,000 करोड़ से अधिक की वित्तीय अनियमितताएँ पाई गईं।
संविधान की ग्यारहवीं अनुसूची में पंचायतों को 29 विषयों के अधिकार देने की बात है, परंतु अधिकांश राज्यों ने इनमें से केवल 5-7 विषयों पर शक्तियाँ हस्तांतरित की हैं। यह केंद्र और राज्य सरकारों की साझा विफलता है। MPLAD और MLALAD फंड का उपयोग अक्सर पंचायत क्षेत्र में होता है, परंतु इसमें ग्राम सभा की कोई भूमिका नहीं होती -यह विकेंद्रीकरण की भावना के विरुद्ध है।
सोशल ऑडिट को कानूनी बाध्यता के बावजूद अधिकांश राज्यों में यह कागजी औपचारिकता बनकर रह गया है। ग्राम सभाओं की बैठकें अनिवार्य हैं, परंतु कोरम न होने पर उन्हें ‘आयोजित’ दिखाने की परंपरा जारी है।
विशेषज्ञ राय एवं निष्कर्ष
पंचायती राज विशेषज्ञ प्रो. जॉर्ज मैथ्यू का मत है कि ‘विकेंद्रीकरण तब तक अधूरा है जब तक नौकरशाही की मानसिकता नहीं बदलती।’ सच्चा ग्रामीण विकास तभी संभव है जब पंचायतों को वित्तीय, प्रशासनिक और कार्यात्मक -तीनों स्तरों पर स्वायत्तता मिले।
