सूचना नहीं, इंतज़ार मिलता है:मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग का सच

“आयोग की रिपोर्ट ही बताती है कि कैसे देरी,और कमजोर व्यस्था ने सूचना के अधिकार को खोखला कर दिया” 

भोपाल।
सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 को भारतीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिना जाता है। यह कानून नागरिक को सत्ता के गलियारों तक पहुँच देता है, सरकारी फाइलों को जनता के सामने खोलता है और जवाबदेही को मजबूर करता है। लेकिन मध्य प्रदेश में यही कानून आज अपने सबसे कमजोर दौर से गुजर रहा है।

काग़ज़ों में RTI आज भी ज़िंदा है।-लेकिन ज़मीनी हकीकत यह है कि यह अधिकार फाइलों के ढेर में दबा हुआ, तारीखों के बोझ तले कुचला हुआ और नागरिक की उम्मीदों से कटा हुआ दिखाई देता है।

राज्य सूचना आयोग की अपनी वार्षिक रिपोर्ट 2024 बताती है कि-31 दिसंबर 2024 तक 17,933 द्वितीय अपीलें और 979 शिकायतें लंबित थीं। यह कोई विपक्षी दल का आरोप नहीं, कोई सामाजिक संगठन का दावा नहीं -यह सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज सच्चाई है।

मुद्दा केसों का बढ़ना नहीं, उन्हें घटने न देना है-

सरकार और आयोग अक्सर यह तर्क देते हैं कि RTI मामलों की संख्या इसलिए बढ़ रही है क्योंकि लोग ज़्यादा जागरूक हो रहे हैं।
यह तर्क अधूरा ही नहीं, भ्रामक भी है।-असल सवाल यह नहीं है कि केस क्यों बढ़े
असल सवाल यह है कि जब केस बढ़ते दिख रहे थे, तब उन्हें घटाने के लिए क्या किया गया?

अगर किसी संस्था को साफ दिख रहा हो कि हर साल हज़ारों नई अपीलें आ रही हैं, और फिर भी:

  • आयुक्तों की संख्या नहीं बढ़ाई जाती
  • सुनवाई की क्षमता नहीं बढ़ती
  • सिस्टम को डिजिटल और तेज़ नहीं किया जाता

तो यह लापरवाही नहीं, बल्कि सोची-समझी उदासीनता कहलाती है।

  • एक साल का लेखा-जोखा: आंकड़े खुद गवाही दे रहे हैं

साल 2024 में:

  • मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग को 6,874 नई द्वितीय अपीलें प्राप्त हुईं
  • लेकिन पूरे वर्ष में सिर्फ 1,140 अपीलों का निपटारा किया जा सका

यह आंकड़ा किसी भी प्रशासनिक प्रणाली के लिए शर्मनाक माना जाएगा। हर साल यदि आने वाले मामलों से कहीं कम मामलों का निपटान हो, तो बैकलॉग बढ़ना स्वाभाविक नहीं, बल्कि अनिवार्य हो जाता है।

इसे प्रशासनिक चूक कहना सच्चाई को कम करके आंकना होगा।
यह दरअसल लोकतन्त्र की हत्या है – जो पहले से बता रहा था कि संकट आने वाला है, फिर भी आंखें मूंद ली गईं।

क्षमता जानते हुए भी उसे न बढ़ाना: नीतिगत चुनाव

कोई भी संस्था यह नहीं कह सकती कि उसे अपनी सीमाओं का अंदाज़ा नहीं था।
राज्य सूचना आयोग को यह पूरी तरह पता था कि:

  • हर साल अपीलों की संख्या बढ़ रही है
  • सुनवाई की गति कम है
  • स्टाफ और आयुक्तों की कमी है

इसके बावजूद यदि:

  • न तो नए आयुक्त समय पर नियुक्त किए गए
  • न ही स्थायी ढांचागत सुधार किए गए

तो यह साफ संकेत देता है कि RTI सरकार की प्राथमिकता सूची में नीचे खिसक चुका है।

छह महीने बिना नेतृत्व: आयोग को अधर में क्यों छोड़ा गया?

मार्च 2024 में:

  • मुख्य सूचना आयुक्त
  • और एक अन्य सूचना आयुक्त
  • सेवानिवृत्त हो गए।
  • नई नियुक्तियाँ हुईं –
    18 सितंबर 2024 को।

यानी लगभग छह महीने तक मध्य प्रदेश राज्य सूचना आयोग:

  • बिना पर्याप्त आयुक्तों के
  • सीमित बेंचों के साथ
  • और घटती सुनवाई क्षमता में
    काम करता रहा।

यह देरी किसी प्राकृतिक आपदा के कारण नहीं थी।
यह देरी किसी कानूनी अड़चन के कारण नहीं थी।
यह देरी सिर्फ इसलिए थी क्योंकि RTI को लेकर कोई जल्दबाज़ी नहीं थी।

अगर अदालत ठप होती, तो हंगामा होता

सोचिए, अगर:

  • कोई हाईकोर्ट
  • या जिला अदालत

छह महीने तक पर्याप्त जजों के बिना चलती, तो क्या होता?

  • मीडिया में हंगामा होता।
  • राजनीतिक बयान आते।
  • सिस्टम पर सवाल उठते।

लेकिन सूचना आयोग छह महीने तक लगभग ठप रहा -और न सरकार ने जवाब दिया,न प्रशासन ने जिम्मेदारी ली।

यह चुप्पी खुद में एक बयान है।

एक आयुक्त पर 4,483 अपीलें: यह व्यवस्था नहीं, सज़ा है

31 दिसंबर 2024 तक:

  • लंबित द्वितीय अपीलें: 17,933
  • कार्यरत सूचना आयुक्त: 4

इसका सीधा अर्थ है:-एक आयुक्त पर औसतन 4,483 अपीलें।

यह किसी भी मानवीय या प्रशासनिक पैमाने से असंभव कार्यभार है।
कोई भी व्यक्ति:

  • इतनी फाइलें पढ़ नहीं सकता
  • इतनी सुनवाई कर नहीं सकता
  • और इतनी जल्दी फैसले दे नहीं सकता

तो फिर सवाल उठता है – क्या व्यवस्था जानबूझकर ऐसी बनाई गई है कि RTI धीमी रहे?

RTI खत्म नहीं किया जा रहा, उसे चलने लायक नहीं छोड़ा जा रहा

यहाँ एक अहम फर्क समझना ज़रूरी है।

RTI को:

  • रद्द नहीं किया गया
  • कानून से नहीं हटाया गया
  • औपचारिक रूप से कमजोर नहीं किया गया

लेकिन उसे इतना धीमा, इतना बोझिल और इतना निराशाजनक बना दिया गया है कि
आम नागरिक सवाल पूछने से पहले ही थक जाए।

यह RTI को मारने की सबसे सुरक्षित रणनीति है।

“तुरंत सूचना” से 5 साल की चुप्पी तक

RTI कानून का मूल दर्शन बिल्कुल स्पष्ट है:

सूचना देर से मिले = सूचना बेकार।

लेकिन मध्य प्रदेश में:

  • द्वितीय अपील की सुनवाई 3 से 5 साल बाद होती है
  • तब तक फाइलें बंद हो चुकी होती हैं
  • अधिकारी ट्रांसफर हो चुके होते हैं
  • और मुद्दा अपनी प्रासंगिकता खो चुका होता है

ऐसी सूचना न्याय नहीं, औपचारिकता बन जाती है।

जनता से जुड़े विभाग, सबसे बड़े उल्लंघनकर्ता

राज्य सूचना आयोग की रिपोर्ट एक और परेशान करने वाली सच्चाई सामने लाती है।

2024 में सबसे ज़्यादा अपीलें आईं:

  • पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग से  – 1,283
  • नगरीय विकास एवं आवास विभाग से  – 1,039

यानी:

  • सड़क
  • पानी
  • आवास
  • पंचायत
    जैसे रोज़मर्रा के मुद्दों पर ही सबसे ज़्यादा जानकारी रोकी जा रही है।

यह दिखाता है कि सूचना छुपाना कोई अपवाद नहीं, बल्कि प्रशासनिक संस्कृति बन चुका है।

दंड का डर खत्म, इसलिए देरी बेहिचक

RTI अधिनियम की धारा 20 में स्पष्ट प्रावधान है:

  • ₹250 प्रतिदिन का जुर्माना
  • अधिकतम ₹25,000

लेकिन व्यवहार में:

  • पेनल्टी बेहद दुर्लभ है
  • आदेश दिए जाते हैं, सज़ा नहीं
  • जवाबदेही तय नहीं होती

जब अधिकारी जानता है कि:

  • देर करने पर कोई कीमत नहीं चुकानी पड़ेगी

तो सूचना देना उसकी प्राथमिकता क्यों बने?

अपील से अपील तक: पेंडेंसी का कब्रिस्तान

यही वजह है कि एक ही मामला:

  • पहले RTI
  • फिर प्रथम अपील
  • फिर द्वितीय अपील

और अंत में राज्य सूचना आयोग की लंबित फाइलों के कब्रिस्तान में पहुँच जाता है।

यह सिर्फ एक व्यक्ति की हार नहीं होती –
यह पूरे सिस्टम की हार होती है।

पारदर्शिता की प्रहरी, खुद अपारदर्शी

RTI अधिनियम की धारा 4 साफ कहती है कि:

“सूचना स्वतः प्रकाशित की जाए।”

लेकिन राज्य सूचना आयोग की वेबसाइट पर:

  • रियल-टाइम पेंडेंसी डेटा नहीं
  • आयुक्त-वार प्रदर्शन नहीं
  • औसत निपटान समय नहीं

जो संस्था पारदर्शिता की पहरेदार है, वही अपने ही आंकड़ों को आम नागरिक से दूर रखे –
यह लोकतंत्र के साथ सीधा मज़ाक है।

RTI को मारने की नई तकनीक: थकान

आज RTI को सीधे खत्म नहीं किया जा रहा।
उसे धीरे-धीरे थकाया जा रहा है।

  • सवाल पूछो
  • सालों इंतज़ार करो
  • तारीखें झेलो
  • और अंत में हार मान लो

यह मॉडल इसलिए खतरनाक है क्योंकि:

  • कानून बना रहता है
  • विरोध नहीं होता
  • और अधिकार खोखला हो जाता है

कुछ सवाल, जिनका जवाब चाहिए

  1. जब कानून 10 आयुक्तों की अनुमति देता है, तो 4 से काम क्यों चलाया जा रहा है?
  2. छह महीने आयोग ठप रहने की ज़िम्मेदारी कौन लेगा?
  3. हर साल बैकलॉग बढ़ने के बावजूद सुधार क्यों नहीं किए गए?
  4. RTI अधिकारियों पर पेनल्टी क्यों नहीं लगती?
  5. आयोग अपना रियल-टाइम डेटा सार्वजनिक क्यों नहीं करता?

निष्कर्ष: 17,933 फाइलें नहीं, 17,933 दबाए गए सवाल

मध्य प्रदेश में RTI आज भी मौजूद है।
लेकिन सत्ता के लिए असुविधाजनक सवाल पूछने की कीमत बढ़ा दी गई है

जब सवाल पूछना आसान नहीं रहेगा,
तो लोकतंत्र सिर्फ चुनाव तक सीमित रह जाएगा।

RTI को खत्म करने के लिए उसे रद्द करने की ज़रूरत नहीं –
बस उसे इतना धीमा कर दो कि लोग सवाल पूछना छोड़ दें।

और यही आज मध्य प्रदेश में हो रहा है।

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