मध्य प्रदेश मानवाधिकार आयोग – आंकड़े, ढांचा और इंदौर पानी मामले पर सवाल
भोपाल।
भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को जीवन का अधिकार, स्वास्थ्य का अधिकार, समानता और मानवीय गरिमा का अधिकार सुनिश्चित करता है। ये अधिकार केवल कानूनी प्रावधान नहीं हैं, बल्कि लोकतंत्र की बुनियाद हैं। इन्हीं अधिकारों की निगरानी और रक्षा के उद्देश्य से देश में राष्ट्रीय और राज्य स्तर पर मानवाधिकार आयोगों का गठन किया गया। मध्य प्रदेश में यह जिम्मेदारी मध्य प्रदेश मानवाधिकार आयोग (MPHRC) को सौंपी गई, जिसकी स्थापना Protection of Human Rights Act, 1993 के अंतर्गत 13 सितंबर 1995 को की गई थी।
काग़ज़ों में यह संस्था नागरिकों के अधिकारों की प्रहरी है, लेकिन जब इसके कामकाज, आंकड़ों, नेतृत्व और हालिया मामलों पर नज़र डाली जाती है, तो एक असहज सवाल उभरकर सामने आता है-
👉 क्या मध्य प्रदेश मानवाधिकार आयोग आज वास्तव में मानवाधिकारों की रक्षा कर रहा है, या वह केवल प्रशासनिक रिपोर्टों और औपचारिकताओं तक सीमित हो चुका है?
नेतृत्व का सवाल: जब संस्था का सिर ही अस्थायी हो
मानवाधिकार आयोग जैसी संवेदनशील संस्था का नेतृत्व एक अनुभवी और स्वतंत्र न्यायिक व्यक्ति के हाथ में होना चाहिए। कानून के अनुसार, आयोग का अध्यक्ष आमतौर पर उच्च न्यायालय का पूर्व मुख्य न्यायाधीश होता है और सदस्यों की नियुक्ति राज्यपाल द्वारा एक उच्चस्तरीय चयन समिति की सिफारिश पर की जाती है, जिसमें मुख्यमंत्री, विधानसभा अध्यक्ष, गृह मंत्री और विपक्ष के नेता शामिल होते हैं। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि आयोग राजनीतिक दबाव से मुक्त होकर कार्य कर सके।
लेकिन वर्तमान स्थिति इस आदर्श से मेल नहीं खाती।
मध्य प्रदेश मानवाधिकार आयोग में इस समय श्री मनोहर ममतानी कार्यवाहक अध्यक्ष (Acting Chairperson) के रूप में कार्य कर रहे हैं, जबकि श्री राजीव कुमार तम्बो आयोग के सदस्य हैं। कार्यवाहक व्यवस्था अपने-आप में अस्थायी होती है और इससे निर्णय लेने की क्षमता, संस्थागत आत्मविश्वास और सक्रियता प्रभावित होती है।
इसके अलावा, 2025 के उत्तरार्ध में आयोग के लिए स्थायी अध्यक्ष की नियुक्ति को लेकर चर्चाएँ तो सामने आईं, लेकिन नियुक्ति टलती रही। कुछ मामलों में प्रशासनिक सदस्य नियुक्त किए गए, पर स्थायी और पूर्ण नेतृत्व का अभाव बना रहा। यह स्थिति बताती है कि आयोग का नेतृत्व ढांचा न केवल कमजोर है, बल्कि अस्थिर भी है।
यह प्रश्न स्वाभाविक है कि जब मानवाधिकार आयोग का नेतृत्व ही अस्थायी हो, तो क्या वह गंभीर और संवेदनशील मानवाधिकार मामलों में सरकार और प्रशासन के सामने मजबूती से खड़ा हो सकता है?
आयोग के अधिकार: काग़ज़ों में व्यापक, व्यवहार में सीमित
Protection of Human Rights Act, 1993 के तहत मध्य प्रदेश मानवाधिकार आयोग को व्यापक अधिकार दिए गए हैं। आयोग का काम है मानवाधिकार उल्लंघन से जुड़ी शिकायतों की जांच करना, सरकारी विभागों और संस्थाओं से रिपोर्ट मंगाना, जेलों और सार्वजनिक संस्थानों का निरीक्षण करना और ज़रूरत पड़ने पर स्वतः संज्ञान लेना। इसका अर्थ यह है कि यदि किसी मामले में मानवाधिकार उल्लंघन की आशंका हो और वह मीडिया या सार्वजनिक विमर्श में सामने आए, तो आयोग बिना औपचारिक शिकायत के भी हस्तक्षेप कर सकता है।
इसके अलावा आयोग राज्य सरकार को सिफारिशें भेज सकता है और यह सुझाव दे सकता है कि भविष्य में ऐसे उल्लंघनों को रोकने के लिए कौन-से कदम उठाए जाएँ। सिद्धांत रूप में यह एक मजबूत तंत्र है।
लेकिन व्यवहार में एक बड़ी सीमा सामने आती है-
आयोग के निर्णय सलाह-परक (advisory) होते हैं। उसके पास न तो दंडात्मक आदेश देने की शक्ति है और न ही यह सुनिश्चित करने का प्रभावी तंत्र कि उसकी सिफारिशों को अनिवार्य रूप से लागू किया जाए। सरकार केवल यह बताने के लिए बाध्य होती है कि उसने आयोग की सिफारिशों पर क्या कार्रवाई की।
यहीं से सवाल उठता है कि जब सिफारिशों को मानना बाध्यकारी नहीं है, तो क्या मानवाधिकारों की वास्तविक रक्षा संभव है?
पेंडिंग मामलों का सच: आंकड़े जो व्यवस्था की कमजोरी दिखाते हैं
मध्य प्रदेश मानवाधिकार आयोग में लंबित मामलों का आंकड़ा खुद आयोग की कार्यक्षमता पर सवाल खड़ा करता है। यद्यपि आयोग की वेबसाइट या वार्षिक रिपोर्टों में अद्यतन आंकड़े सहज रूप से उपलब्ध नहीं होते, लेकिन विधानसभा में प्रस्तुत सरकारी जवाबों से यह सामने आया है कि 2024-25 के अंत तक लगभग 4,669 मानवाधिकार शिकायतें आयोग में लंबित थीं।
यह संख्या यूँ ही नहीं बढ़ी।
2020-21 में जहाँ पेंडिंग शिकायतों की संख्या लगभग 2,798 थी, वहीं कुछ ही वर्षों में यह बढ़कर 4,600 से अधिक हो गई। इसका सीधा अर्थ यह है कि शिकायतें दर्ज होने की गति, उनके निपटान की गति से कहीं अधिक है।
यह स्थिति दो बातों की ओर संकेत करती है-
पहली, राज्य में मानवाधिकार उल्लंघनों की शिकायतें लगातार बढ़ रही हैं।
दूसरी, आयोग की सुनवाई और निपटान क्षमता इस बोझ को संभाल पाने में सक्षम नहीं दिख रही।
यहाँ यह सवाल टालना मुश्किल है कि क्या आयोग के पास पर्याप्त स्टाफ, जांच अधिकारी, कानूनी विशेषज्ञ और संसाधन हैं, या फिर यह संस्था भी वही संकट झेल रही है जो सूचना आयोग जैसी अन्य संवैधानिक संस्थाएँ झेल रही हैं?
इंदौर पानी संकट: जब स्वास्थ्य आपदा मानवाधिकार सवाल बन जाती है
इंदौर के भागीरथपुरा क्षेत्र में सामने आया पीने के पानी का संकट केवल एक स्थानीय प्रशासनिक चूक नहीं था। दूषित और सीवेज-मिश्रित पानी के सेवन से सैकड़ों लोग बीमार पड़े और विभिन्न रिपोर्टों के अनुसार कम से कम 16 से 30 लोगों की मौतें पानी-जनित बीमारियों से जुड़ी बताई गईं।
यह घटना सीधे-सीधे जीवन के अधिकार और स्वास्थ्य के अधिकार से जुड़ी थी। जब नागरिकों को स्वच्छ पेयजल उपलब्ध नहीं कराया जा सका और इसके कारण जानें चली गईं, तो यह एक स्पष्ट मानवाधिकार संकट बन गया।
इस मामले में स्थानीय प्रशासन और स्वास्थ्य विभाग से लेकर अदालतों तक सवाल उठे। मीडिया में लगातार रिपोर्टिंग हुई। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग ने भी इस पर संज्ञान लिया और राज्य सरकार से जवाब मांगा। लेकिन इसी दौरान मध्य प्रदेश मानवाधिकार आयोग की चुप्पी कई लोगों को खटकती रही।
सुओ-मोटो क्यों नहीं? यही सबसे बड़ा सवाल है
मानवाधिकार आयोग की सबसे बड़ी ताकत उसका स्वतः संज्ञान (suo motu) लेने का अधिकार होता है। यह अधिकार इसलिए दिया गया है ताकि नागरिकों को हर बार शिकायत दर्ज कराने की जटिल प्रक्रिया से न गुजरना पड़े, खासकर तब जब मामला व्यापक जनहित और गंभीर अधिकार उल्लंघन से जुड़ा हो।
इंदौर जैसे बड़े शहर में, जहाँ पानी के कारण मौतों की खबरें सामने आईं, वहाँ स्वतः संज्ञान न लेना आयोग की प्राथमिकताओं पर सवाल खड़ा करता है।
क्या यह मामला मानवाधिकार आयोग के अधिकार क्षेत्र में नहीं आता था?
या फिर आयोग ने यह मान लिया कि प्रशासनिक जांच पर्याप्त है?
यह चुप्पी केवल निष्क्रियता नहीं, बल्कि एक संदेश भी देती है-कि गंभीर संकटों पर भी हस्तक्षेप अनिवार्य नहीं समझा जाता।
NHRC बनाम MPHRC: सक्रियता का अंतर
जब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग बच्चों की मौत, पुलिस हिरासत में हिंसा या पर्यावरणीय संकटों पर स्वतः संज्ञान लेकर राज्य सरकारों से जवाब मांग सकता है, तो राज्य स्तर पर यही तत्परता क्यों नहीं दिखती?
यह अंतर दर्शाता है कि राज्य मानवाधिकार आयोग संरचनात्मक रूप से कमजोर हैं-चाहे वह संसाधनों की कमी हो, नेतृत्व का अभाव हो या राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी।
इसका सीधा असर नागरिकों पर पड़ता है। शिकायतें बढ़ती हैं, सुनवाई में देरी होती है और लोगों का भरोसा संस्थाओं से उठने लगता है।
निष्कर्ष: संस्था है, लेकिन भरोसा कमजोर
मध्य प्रदेश मानवाधिकार आयोग का अस्तित्व संवैधानिक और कानूनी रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। लेकिन पेंडिंग मामलों का बढ़ता बोझ, स्थायी नेतृत्व की कमी और गंभीर मामलों में निष्क्रियता यह संकेत देती है कि संस्था अपनी पूरी क्षमता से काम नहीं कर पा रही है।
जब पीने के पानी जैसी बुनियादी मानवाधिकार समस्या में लोगों की जान चली जाती है और आयोग समय पर सक्रिय नहीं होता, तो यह केवल प्रशासनिक चूक नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम की विफलता बन जाती है।
👉 मानवाधिकार तब तक सुरक्षित नहीं रह सकते,
जब तक उनकी रक्षा करने वाली संस्थाएँ खुद जवाबदेही और सक्रियता को अपनी पहली प्राथमिकता नहीं बनातीं।
