सार्थक ऐप:- हाजिरी ऑनलाइन, कर्मचारी ऑफलाइन -एमपी में सरकारी कर्मचारियों की अटेंडेंस की हकीकत

Bhopal

मध्य प्रदेश सरकार ने सरकारी कर्मचारियों की उपस्थिति को पूरी तरह पारदर्शी और डिजिटल बनाने के बड़े दावे के साथ सार्थक ऐप लॉन्च किया था।

यह ऐप जियो-फेंसिंग, सेल्फी वेरिफिकेशन और रियल-टाइम लोकेशन ट्रैकिंग का इस्तेमाल करके हाजिरी लगवाता है।

उद्देश्य बहुत नेक था फर्जी अटेंडेंस को पूरी तरह रोकना, अनुशासन कायम करना और अफसरों को तुरंत रिपोर्ट उपलब्ध कराना।

लेकिन तीन साल बाद हकीकत इसके ठीक उलट दिख रही है।

कई कर्मचारी ऐप पर हाजिरी तो ऑनलाइन लगा लेते हैं, लेकिन कार्यस्थल पर पहुंचते ही गायब हो जाते हैं या पहुंचते ही नहीं।

खास तौर पर उच्च शिक्षा विभाग में कॉलेज प्रोफेसर और अतिथि विद्वान सुबह हाजिरी मार्क करके क्लासेस छोड़कर चले जाते हैं।

नतीजा स्टूडेंट्स की पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हो रही है।

2025 से 2026 के बीच फर्जीवाड़े के सैकड़ों मामले सामने आए हैं।

तकनीकी खामियां, नेटवर्क की समस्याएं और कर्मचारियों का खुला विरोध भी लगातार बना हुआ है।

आइए डेटा और वास्तविक उदाहरणों के साथ इसकी पूरी हकीकत को विस्तार से समझते हैं।

सार्थक ऐप क्या है और यह कैसे काम करता है?

सार्थक ऐप मध्य प्रदेश सरकार का अपना मोबाइल-बेस्ड कर्मचारी प्रबंधन सिस्टम है।

यह Google Play Store पर उपलब्ध है और मुख्य रूप से उच्च शिक्षा, स्वास्थ्य, राजस्व, स्कूल शिक्षा और अन्य विभागों में लागू किया गया है।

ऐप की मुख्य विशेषताएं हैं केवल निर्धारित कार्यस्थल की जियो-फेंसिंग के अंदर ही हाजिरी लगना, सेल्फी के साथ फोटो अनिवार्य होना, प्रवेश और निकास का समय रिकॉर्ड होना, छुट्टी या टूर के लिए ऑनलाइन आवेदन।

2023-2024 में स्वास्थ्य और उच्च शिक्षा विभाग में इसे अनिवार्य किया गया था।

2025 में सरकारी कॉलेजों और संजीवनी क्लिनिकों में सख्ती बढ़ाई गई प्रोफेसरों और कर्मचारियों को कम से कम 6 घंटे कार्यस्थल पर रहना जरूरी कर दिया गया, नहीं तो वेतन कटौती का प्रावधान।

सरकार का दावा था कि ऐप से फर्जी कर्मचारी पकड़े जाएंगे, पूरे समय ड्यूटी सुनिश्चित होगी और उच्च अधिकारियों को रियल-टाइम रिपोर्ट मिलेगी।

लेकिन अमल में यह दावा खोखला साबित हो रहा है।

हकीकत: फर्जी हाजिरी और “हाजिरी लगाकर गायब” की मनमानी

ऐप लागू होने के बाद फर्जीवाड़ा रुकने की बजाय और परिष्कृत हो गया है।

कर्मचारी एडिटेड फोटो, लोकेशन स्पूफिंग ऐप्स, कैमरा ट्रिक्स या घर से ही हाजिरी लगाने के तरीके इस्तेमाल कर रहे हैं।

उच्च शिक्षा विभाग में यह समस्या सबसे गंभीर है।

प्रोफेसर और अतिथि विद्वान सुबह कॉलेज पहुंचकर हाजिरी मार्क करते हैं और फिर घंटों के लिए गायब हो जाते हैं।

क्लासेस खाली रहती हैं, स्टूडेंट्स बिना पढ़ाई के बैठे रहते हैं।

कुछ प्रमुख मामले:

  • जुलाई 2025 में भोपाल में 4 प्रोफेसर (दो प्रभारी प्राचार्य, एक अतिरिक्त संचालक और एक सहायक प्राध्यापक) घर बैठे फर्जी हाजिरी लगाते पकड़े गए। सभी को तत्काल निलंबित कर दिया गया।
  • जून 2025 में सागर जिले के रहली कॉलेज में 6 अतिथि विद्वान महीनों से घर से हाजिरी लगा रहे थे और पूरा वेतन ले रहे थे। उनकी सेवाएं समाप्त कर दी गईं।
  • भोपाल के गंजबासौदा कन्या महाविद्यालय में भी 6 अतिथि विद्वान इसी तरह बर्खास्त हुए।
  • जबलपुर संभाग में स्पष्ट नियम जारी हुआ “कॉलेज में चेहरा दिखाकर गायब होने वाले प्रोफेसरों का वेतन नहीं मिलेगा।” क्योंकि कई प्रोफेसर हाजिरी के बाद क्लास छोड़कर चले जाते थे।
  • जून 2025 से नया नियम लागू हुआ कि प्रोफेसरों को कम से कम 6 घंटे कॉलेज में रहना होगा और ऐप प्रवेश-निकास दोनों ट्रैक करेगा। फिर भी कई इसे बायपास कर लेते हैं।
  • इंदौर, उज्जैन और ग्वालियर के कॉलेजों से लगातार शिकायतें आ रही हैं कि प्रोफेसर हाजिरी लगाकर “गायब” हो जाते हैं, क्लासेस खाली रहती हैं।

स्वास्थ्य विभाग में भी हालत कम नहीं है। जनवरी 2026 में एक बड़ी जांच में 48 जिलों के 170 डॉक्टर फर्जी हाजिरी लगाते पकड़े गए। बैतूल में 5 डॉक्टर 150-200 किमी दूर से हाजिरी मार्क कर रहे थे।

खरगोन में 115 शिक्षक अनुपस्थित पाए गए, सतना में तो 92% शिक्षक ई-अटेंडेंस में गैरहाजिर दिखे।

ये सभी मामले साफ बताते हैं कि हाजिरी तो ऑनलाइन हो रही है, लेकिन कर्मचारी खासकर कॉलेज प्रोफेसर ज्यादातर समय ऑफलाइन ही रहते हैं।

तकनीकी खामियां और कर्मचारियों का विरोध

ऐप की सबसे बड़ी कमजोरी उसकी तकनीकी गड़बड़ियां हैं।

कई बार कर्मचारी कैंपस पर मौजूद होते हैं, फिर भी ऐप लोकेशन गलत दिखाता है।

ग्रामीण और दूरदराज के कॉलेजों-क्लिनिकों में नेटवर्क नहीं होने से हाजिरी ही नहीं लग पाती।

स्वास्थ्य कर्मचारियों ने शिकायत की कि रात 11 बजे तक ड्यूटी होती है, लेकिन ऐप शाम 5 बजे के बाद बंद हो जाता है।

2025 में जबलपुर, उज्जैन और इंदौर में स्वास्थ्य कर्मचारियों और शिक्षक संघों ने प्रदर्शन किए।

मांग थी ऐप बंद करो या समय सीमा बढ़ाओ।

शिक्षक संघों ने डेटा सिक्योरिटी पर भी सवाल उठाए कई शिक्षकों को पाकिस्तानी नंबरों से कॉल आने की शिकायतें आईं।

24 घंटे ट्रैकिंग को निजता का उल्लंघन बताया गया।

ईमानदार कर्मचारियों को भी परेशानी हो रही है मौजूदगी के बावजूद गैरहाजिर दिखना और वेतन कटना।

प्रभाव और सरकारी कार्रवाई

इस पूरे सिस्टम का सबसे बड़ा नुकसान शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं पर पड़ रहा है।

स्टूडेंट्स बिना प्रोफेसर के क्लासेस में बैठे रहते हैं, उनकी पढ़ाई चौपट हो रही है।

मरीजों को डॉक्टर नहीं मिलते।

प्रोफेसरों की “हाजिरी लगाकर गायब” वाली आदत से युवा पीढ़ी का भविष्य दांव पर लग गया है।

सरकार ने कार्रवाई भी की निलंबन, बर्खास्तगी, वेतन कटौती और नोटिस जारी किए।

लेकिन ये कार्रवाइयां छिटपुट हैं, बड़े पैमाने पर सुधार नहीं दिख रहा।

सरकार का सकारात्मक दावा है कि ऐप से फर्जी कर्मचारी पकड़े जा रहे हैं और अनुशासन बढ़ रहा है।

लेकिन जमीनी हकीकत इसके विपरीत है।

नेक इरादा, कमजोर अमल

सार्थक ऐप शुरू करने का विचार बहुत अच्छा था।

यह पारदर्शिता और जवाबदेही लाने का एक आधुनिक तरीका हो सकता था।

लेकिन तकनीकी खामियां, फर्जीवाड़े की नई-नई तरकीबें और “हाजिरी लगाकर गायब” जैसी मनमानी ने इसे कमजोर बना दिया है।

कॉलेज प्रोफेसरों के मामले सबसे गंभीर हैं क्योंकि इससे सीधे स्टूडेंट्स की पढ़ाई प्रभावित हो रही है।

सरकार को अब ऐप में बड़े सुधार करने होंगे बेहतर सिक्योरिटी, मजबूत नेटवर्क सपोर्ट, सख्त मॉनिटरिंग और कर्मचारियों की वाजिब शिकायतों का समाधान।

नहीं तो “सार्थक” नाम वाला यह ऐप “व्यर्थ” ही बना रहेगा।

असल बदलाव तभी आएगा जब हाजिरी के साथ-साथ वास्तविक ड्यूटी भी सुनिश्चित हो।

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