NCRB: 2022 में महिलाओं के विरुद्ध साइबर अपराध में 110% वृद्धि -IT कानून और सरकारी तंत्र कहाँ विफल हुए?
जैसे-जैसे भारत डिजिटल होता जा रहा है, महिलाओं के लिए साइबर स्पेस एक नए खतरे का क्षेत्र बनता जा रहा है। ऑनलाइन उत्पीड़न, साइबर स्टॉकिंग, ‘रिवेंज पोर्न’, डीपफेक और डिजिटल वित्तीय ठगी -ये सब महिलाओं की डिजिटल स्वतंत्रता को सीमित कर रहे हैं। सरकार ने IT Act 2000, IT Amendment Act 2008 और BNS 2023 में प्रावधान किए हैं, परंतु क्रियान्वयन की स्थिति निराशाजनक है।
तथ्यात्मक आँकड़े
NCRB की ‘Crime in India 2022’ रिपोर्ट के अनुसार, महिलाओं के विरुद्ध साइबर अपराध के 24,702 मामले दर्ज हुए -2021 की तुलना में 110% की भारी वृद्धि। इनमें से 63% मामले ऑनलाइन उत्पीड़न, 16% साइबर स्टॉकिंग और 12% अश्लील सामग्री प्रसार से संबंधित थे। Internet Freedom Foundation की रिपोर्ट बताती है कि पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक रूप से सक्रिय महिलाएँ सबसे अधिक लक्षित होती हैं।
ITU (International Telecommunication Union) के 2023 आँकड़ों के अनुसार, भारत में पुरुष इंटरनेट उपयोगकर्ताओं की तुलना में महिला उपयोगकर्ताओं की संख्या 40% कम है। NFHS-5 बताती है कि ग्रामीण महिलाओं में इंटरनेट उपयोग मात्र 25% है, और साइबर उत्पीड़न के भय से महिलाएँ सोशल मीडिया छोड़ रही हैं।
सरकार की आलोचना
सरकार की सबसे बड़ी विफलता साइबर थानों में प्रशिक्षित महिला अधिकारियों की कमी है। National Cyber Crime Reporting Portal (cybercrime.gov.in) पर दर्ज शिकायतों में निपटान दर 2022-23 में मात्र 8-9% रही -MHA की स्वयं की रिपोर्ट यह स्वीकार करती है। ‘डीपफेक’ के बढ़ते खतरे पर सरकार ने नवंबर 2023 में एडवाइजरी जारी की, परंतु कोई ठोस कानूनी प्रावधान नहीं बनाया।
IT Rules 2021 के अंतर्गत सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर महिला-विरुद्ध सामग्री हटाने की 24 घंटे की समयसीमा है, परंतु इसकी अनुपालना जाँचने वाला कोई स्वतंत्र नियामक तंत्र नहीं है। Parliamentary Standing Committee on IT ने 2022 में यह माना कि साइबर अपराध विधि तंत्र ‘severely under-resourced’ है।
समाजिक प्रभाव एवं विशेषज्ञ राय
UNESCO की 2023 रिपोर्ट ‘Behind the Screens’ के अनुसार, 85% महिला पत्रकारों ने ऑनलाइन उत्पीड़न का अनुभव किया है और 38% ने इसके कारण सेल्फ-सेंसरशिप अपनाई। डिजिटल अधिकार विशेषज्ञ प्रतीक वाघरे का मत है कि साइबर सुरक्षा नीतियाँ लिंग-संवेदनशील नहीं हैं और पीड़िता को ही जवाबदेह ठहराने की प्रवृत्ति बनी हुई है।
समाधान एवं निष्कर्ष
प्रत्येक जिले में विशेष महिला साइबर सेल स्थापित हो। स्कूल पाठ्यक्रम में डिजिटल सुरक्षा और साइबर अधिकार की शिक्षा अनिवार्य की जाए। डीपफेक के विरुद्ध स्पष्ट दंडात्मक कानून बने। डिजिटल भारत की सफलता तभी सार्थक है जब उसमें महिलाएँ न केवल शामिल हों, बल्कि सुरक्षित भी हों।
