कल्पना कीजिए-आने वाले 10 सालों में हर घर में कोई न कोई कैंसर से जूझता नजर आएगा।
शोध बता रहे हैं कि स्थिति और गंभीर होने वाली है। ICMR की रिपोर्ट्स चेतावनी दे रही हैं: भारत में हर 9 में से 1 व्यक्ति को जीवनकाल में कैंसर का खतरा है। मामले तेजी से बढ़ रहे हैं-2025 में 15.7 लाख नए केस, 2040 तक 22 लाख तक पहुंचने का अनुमान। मध्य प्रदेश में भी यही तस्वीर है। तंबाकू, प्रदूषण, भोपाल गैस त्रासदी का पुराना जख्म और देर से पता चलना-ये सब मिलकर मौत का नया कारण बन रहे हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल: इलाज की सुविधाएं कहां हैं?
आंकड़े जो डराते हैं
- हर साल 70-80 हजार नए मरीज मध्य प्रदेश में सामने आ रहे हैं-ICMR-NCRP की रिपोर्ट्स और राज्य अनुमानों के आधार पर यह संख्या लगातार बढ़ रही है।
- तंबाकू से जुड़े कैंसर (मुंह, गला, फेफड़े) सबसे ज्यादा-मध्य प्रदेश में तंबाकू सेवन की दर राष्ट्रीय औसत से ऊपर है, जहां पुरुषों में 38% धूम्रपान और 39% धूम्ररहित तंबाकू का इस्तेमाल करते हैं, जिससे तंबाकू संबंधित कैंसर के मामले सबसे अधिक हैं।भारत में तंबाकू से होने वाले कैंसर के मामले 2015 में 1.69 लाख थे, जो 2025 तक 2.36 लाख तक पहुंचने का अनुमान-मध्य प्रदेश जैसे राज्यों में यह बोझ सबसे ज्यादा।
- भोपाल गैस प्रभावित क्षेत्र में 4,000 से ज्यादा मामले दर्ज-2025 तक गैस राहत विभाग के आंकड़ों में 4,000+ कैंसर मरीज रजिस्टर्ड, और अध्ययनों में 1985 में गर्भ में रहे पुरुषों में कैंसर का जोखिम 27 गुना ज्यादा पाया गया।
- एम्स भोपाल में आने वाले 62% मरीज दूसरे जिलों से-यह साफ दिखाता है कि राज्य के ज्यादातर जिलों में जांच और इलाज की सुविधाएं नाममात्र की हैं।
- राष्ट्रीय चेतावनी: ICMR के अनुसार, भारत में हर 9 में से 1 व्यक्ति को जीवनकाल में कैंसर होने का खतरा है। 2025 में 15.7 लाख नए मामले अनुमानित हैं, जो 2040 तक 22 लाख तक पहुंच सकते हैं-आने वाले दशक में कैंसर हर घर तक पहुंच सकता है, हालत और भयावह होगी अगर अभी नहीं चेते।
- कृषि में रसायनों का बढ़ता खतरा: पंजाब की तरह मध्य प्रदेश में भी कृषि में कीटनाशकों और रासायनिक उर्वरकों का अत्यधिक उपयोग कैंसर का बड़ा कारण बन रहा है। मालवा क्षेत्र (कपास पट्टी) में अध्ययनों से मिट्टी, पानी और फसलों में भारी धातुओं (कैडमियम, क्रोमियम, जिंक आदि) का उच्च स्तर पाया गया, जो पंजाब की मालवा स्थिति से मिलता-जुलता है। पंजाब में कीटनाशकों से जुड़े कैंसर मामले बदनाम हैं (मालवा में राष्ट्रीय औसत से ज्यादा रेट), और एमपी में भी यही पैटर्न दिख रहा-ग्रामीण किसानों और उनके परिवारों में कैंसर का जोखिम बढ़ा।
ये आंकड़े ICMR-NCRP की हालिया रिपोर्ट्स (2024-2025), अध्ययनों और सरकारी डेटा से आए हैं। कृषि रसायनों का असर अब साफ दिख रहा-पंजाब की तरह एमपी में भी ग्रामीण क्षेत्रों में कैंसर तेजी से फैल रहा है। बिना तुरंत कदम (ऑर्गेनिक फार्मिंग, जागरूकता) के स्थिति नियंत्रण से बाहर हो सकती है।
सुविधाएं: नाम बड़े, दर्शन छोटे
राज्य में कैंसर का इलाज अभी कुछ गिने-चुने केंद्रों तक सिमटा है:
- भोपाल: एम्स और जवाहरलाल नेहरू कैंसर अस्पताल (JNCHRC) एम्स भोपाल में सालाना करीब 36,000 कैंसर मरीज आते हैं (2025 डेटा)-यानी रोजाना औसतन 100 मरीज। इनमें 62% दूसरे जिलों से हैं, जिससे OPD और रेडियोथेरेपी में लंबी वेटिंग लिस्ट रहती है। JNCHRC में सालाना 10,000 नए केस रजिस्टर होते हैं, लेकिन मशीनें और स्टाफ की कमी से इलाज में हफ्तों-महीनों की देरी आम है।
- इंदौर: गवर्नमेंट कैंसर अस्पताल मुख्य सरकारी केंद्र, लेकिन पुरानी मशीनें और भीड़ के कारण मरीजों को रेडियोथेरेपी के लिए 1-3 महीने इंतजार करना पड़ता है।
- ग्वालियर: कैंसर रिसर्च इंस्टीट्यूट क्षेत्रीय सुविधा, लेकिन पूरे राज्य की मांग पूरी नहीं कर पाता।
बस। बाकी 52 में से ज्यादातर जिलों में स्पेशलाइज्ड कैंसर यूनिट या स्क्रीनिंग सेंटर नहीं-मरीजों को सैकड़ों किलोमीटर यात्रा करनी पड़ती है।
- रेडियोथेरेपी मशीनें: मुश्किल से 5-10 काम कर रही हैं (AERB लाइसेंस्ड सेंटर्स और हालिया रिपोर्ट्स के आधार पर)। अंतरराष्ट्रीय मानक के मुताबिक दर्जनों चाहिए, लेकिन ज्यादातर मेडिकल कॉलेजों में LINAC या ब्रैकीथेरेपी यूनिट तक नहीं। नई टेंडर्स (इंदौर, भोपाल, ग्वालियर, रीवा) जारी हुईं, लेकिन अभी अमल में समय लगेगा। नतीजा-रेडिएशन थेरेपी के लिए महीनों की वेटिंग, कई मरीज बीच में इलाज छोड़ देते हैं।
- ऑन्कोलॉजिस्ट डॉक्टर: भारी कमी-90% से ज्यादा मेडिकल ऑन्कोलॉजिस्ट के पद खाली (2022-2025 रिपोर्ट्स)। रेडिएशन ऑन्कोलॉजिस्ट भी कम, जिससे मरीजों को सही समय पर विशेषज्ञ नहीं मिलते।
- जिला अस्पतालों में स्क्रीनिंग: अभी शुरू भी नहीं हुई ठीक से-PHC स्तर पर घोषणा हुई, लेकिन अमल नाकाफी। देर से डायग्नोसिस (मीडियन डिले 20-88 दिन राष्ट्रीय स्तर पर) से ज्यादातर मरीज स्टेज-3 या 4 में पहुंचते हैं।
नतीजा? मरीज भोपाल-इंदौर का चक्कर लगाते हैं या मुंबई-दिल्ली भागते हैं। प्राइवेट अस्पतालों में लाखों खर्च। यात्रा, रहने और देरी के कारण कई तो बीच में इलाज छोड़ देते हैं-रिपोर्ट्स बताती हैं कि ग्रामीण मरीजों में ड्रॉपआउट रेट उच्च है, और असमय मौतें बढ़ रही हैं।
मरीजों की चीख जो कोई नहीं सुन रहा
ग्रामीण और दूरदराज के मरीजों को भोपाल या इंदौर जैसे केंद्रों तक पहुंचने में भारी आर्थिक बोझ झेलना पड़ता है। एक अध्ययन के अनुसार, 1,500 किमी से ज्यादा यात्रा करने वाले मरीजों का गैर-मेडिकल खर्च (यात्रा, रहना, खाना) औसतन ₹1,07,000 तक पहुंच जाता है। कुल आउट-ऑफ-पॉकेट खर्च (OOPE) प्रति मरीज सालाना ₹3-4 लाख तक होता है, जिसमें दवाएं और डायग्नोस्टिक्स का बड़ा हिस्सा शामिल है। कई परिवार कर्ज लेकर या संपत्ति बेचकर इलाज कराते हैं, फिर भी 39% से ज्यादा मामलों में डिस्ट्रेस फाइनेंसिंग (कर्ज या बिक्री) होती है।
देर से पता चलने की वजह से ज्यादातर मरीज स्टेज-3 या 4 में पहुंचते हैं-भारत में ब्रेस्ट कैंसर के 57%, सर्विक्स के 60% और हेड-नेक कैंसर के 70% से ज्यादा मामले लोकली एडवांस्ड स्टेज में डायग्नोज होते हैं। मध्य प्रदेश में भी यही पैटर्न है, जहां ग्रामीण क्षेत्रों में स्क्रीनिंग की कमी से इलाज लगभग नामुमकिन हो जाता है और सर्वाइवल रेट गिर जाता है।
भोपाल गैस त्रासदी के पीड़ित आज भी कैंसर से जूझ रहे हैं-गैस राहत विभाग के आंकड़ों में 4,000 से ज्यादा कैंसर मरीज रजिस्टर्ड हैं। इन यूटरस एक्सपोज्ड पुरुषों में कैंसर का जोखिम 27 गुना ज्यादा पाया गया है। सुविधाओं की कमी से मौतें जारी हैं, और पीड़ित परिवारों का दर्द आज भी कम नहीं हुआ।
कई मरीजों की आवाज यही है-“पैसे नहीं तो इलाज नहीं, बस दर्द सहते रहो।” फाइनेंशियल टॉक्सिसिटी की वजह से ट्रिटमेंट अबैंडनमेंट रेट हाई है-बच्चों के कैंसर में भी 20-30% परिवार इलाज बीच में छोड़ देते हैं। गरीब परिवारों में यह बोझ भावनात्मक और सामाजिक अलगाव भी लाता है।
अब वक्त है जागने का
कैंसर अब दूर की बीमारी नहीं रही। यह हर घर की दहलीज पर दस्तक दे रहा है। आने वाले 10 सालों में स्थिति और भयानक हो सकती है। सरकार के ऐलान सराहनीय हैं, लेकिन तेज अमल चाहिए-हर जिले में स्क्रीनिंग यूनिट, ज्यादा डॉक्टर, मशीनें और जागरूकता।
अगर अभी नहीं चेते, तो कल बहुत देर हो जाएगी। हर मरीज को समय पर इलाज मिले-यही एकमात्र रास्ता है इस बढ़ती छाया को रोकने का।
